मलेशेमऊ/लखनऊ–28 मार्च
राजधानी लखनऊ में इन दिनों विकास की बयार बहे न बहे, लेकिन ‘कब्ज़ा पॉलिटिक्स’ की खुशबू (या दुर्गंध) ज़ोरों पर है। नगर निगम ज़ोन-4 के मलेशेमऊ गाँव में एक ऐसा ‘भूमि सुधार’ कार्यक्रम चल रहा है, जिसे देखकर बड़े-बड़े आर्किटेक्ट भी शर्मिंदा हो जाएं। यहाँ ईंट-सीमेंट से नहीं, बल्कि कूड़े और गोबर के ‘पवित्र’ लेप से सरकारी ज़मीन को अपना बनाने का दिव्य अनुष्ठान चल रहा है गोबर से ‘ग़रीबी’ नहीं, रियासत मिटा रहे दबंग||
सूत्रों की मानें तो मलेशेमऊ के एक स्थानीय ‘सुपरमैन’ ने सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करने का नायाब और इको-फ्रेंडली तरीका खोज निकाला है||
पहले ज़मीन पर कूड़ा फेंका जाता है, फिर उस पर गोबर की परत चढ़ाई जाती है||
तर्क शायद यह है कि प्रशासन को लगे—और इसी गंदगी की आड़ में धीरे-धीरे ज़मीन ‘साफ’ कर अपनी मिल्कियत में जोड़ ली जाती है||
पत्थरों का पहरा राहगीरों का बुरा हाल||
दबंगई का आलम यह है कि सरकारी सड़क को अपनी जागीर समझते हुए किनारे-किनारे बड़े-बड़े पत्थर गाड़ दिए गए हैं||
सड़क अब इतनी संकरी हो गई है कि दो लोग साथ चलें तो प्रशासन की ‘चुप्पी’ से टकरा जाएं||
राहगीर जान जोखिम में डालकर निकल रहे हैं और बड़े हादसे का इंतज़ार शायद इसलिए किया जा रहा है ताकि फाइलें खोलने का कोई ठोस बहाना मिल सके||
प्रशासन देख कर भी ‘अंधा’ सुनकर भी ‘बहरा’ बना हैसबसे दिलचस्प पहलू नगर निगम और तहसील प्रशासन की भूमिका है||
ऐसा लगता है कि अधिकारियों ने ‘गाँधी जी के तीन बंदरों’ वाले सिद्धांत को ज़रूरत से ज़्यादा गंभीरता से ले लिया है||
राजधानी की वीआईपी ज़मीनें डकारी जा रही हैं, लोग शिकायतें कर रहे हैं, लेकिन साहबों के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही||
शायद वे इस इंतज़ार में हैं कि जब पूरा रास्ता ‘गोबर-महल’ बन जाएगा,तब वे फीता काटने आएँगे||
क्या प्रशासन को अब गोबर और पत्थरों में भी विकास दिखने लगा है?
या फिर ‘मौन व्रत’ धारण करना ही अब सरकारी ड्यूटी का हिस्सा है?
यह सवाल आज मलेशेमऊ का हर परेशान नागरिक पूछ रहा है||
अगर समय रहते इस ‘गोबर-लीला’ पर लगाम नहीं लगाई गई, तो वह दिन दूर नहीं जब राजधानी की सड़कों पर चलने के लिए भी आम आदमी को इन ‘कब्ज़ा-वीरों’ से अनुमति लेनी होगी। मुख्यमंत्री के ज़ीरो टॉलरेंस वाले शहर में इस तरह की ‘खुली छूट’ वाकई प्रशासन की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है||
ब्यूरो रिपोर्ट
दैनिक सुदर्शन प्रवाह








