
सीतापुर–19 फरवरी
उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन के अन्दर चल रहे संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार का एक ऐसा घिनौना खेल सामने आया है जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया है|
लखनऊ स्थित ZAO ट्रांसमिशन ऑफिस अब दलाली और रिश्वतखोरी का अड्डा बन चुका है जहाँ कर्मचारियों को अपने ही कॉन्ट्रीब्यूटरी प्रोविडेंट फंड के पैसे निकालने के लिए भारी भरकम चढ़ावा चढ़ाना पड़ रहा है।
हैरानी की बात यह है कि यह पैसा किसी विलासिता के लिए नहीं,बल्कि कर्मचारियों के बीवी-बच्चों के इलाज के लिए मांगा जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, यहां रेट कार्ड तय है
मोटा कमीशन मिलने पर फाइल पर तत्काल मुहर और भुगतान किया जाता है
कम पैसा मिलने पर फाइल महीनों तक धूल फांकती रहती है और रिश्वत न देने पर तो काम रोकने के साथ-साथ कर्मचारियों को डराया–धमकाया तक जाता है
जानकारों की मानें तो इस पाप की कमाई का हिस्सा ऊपर तक बंटता है, जिससे इस दफ्तर में कार्यरत भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के हौसले बुलंद है|
इस मामले की गूंज जब शक्ति भवन तक पहुंची तब मामले की जांच कराई गई जांच कमेटी ने आरोपों को सही पाया निदेशक कार्मिक ट्रांसमिशन ने त्वरित कार्यवाही करते हुए मुख्य दोषी कार्मिक को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था|
सिर्फ निलंबन ही काफी नहीं है अब कर्मचारी आचरण नियमावली 1956 के चीथड़े उड़ाने वाले इन सफेदपोश डकैतों को चार्जशीट देने की तैयारी चल रही है।
अध्यक्ष उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड की पैनी नजर अब उन अन्य दोषियों पर भी है जो इस वसूली तंत्र के पीछे रहकर मलाई काट रहे थे।
लापरवाही,धमकी और भ्रष्टाचार के इस कॉकटेल को खत्म करने के लिए अब बड़े स्तर पर अनुशासनिक कार्यवाही की तलवार लटक रही है।
सवाल यह है: क्या एक निलंबन से यह जहरीला सिस्टम सुधरेगा? या फिर उन बड़े चेहरों को भी बेनकाब किया जाएगा जिनके संरक्षण में यह वसूली का खेल चल रहा था?
ब्यूरो रिपोर्ट
दैनिक सुदर्शन प्रवाह








