न्यायालय ने दिया संपत्ति से अवैध रूप से बेदखल की गई महिला को एक लाख
लखनऊ–09 जनवरी
यह आदेश इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सिविल जज के खिलाफ जारी किए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक महिला और उसके तीन नाबालिग बच्चों को उनके आवासीय संपत्ति से अवैध रूप से बेदखल किए जाने के मामले में एक लाख रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया न्यायालय ने न केवल संपत्ति का कब्ज़ा बहाल करने का आदेश दिया बल्कि यह भी निर्देश दिया कि इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए ताकि अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना एकतरफा अंतरिम आदेश पारित करने के लिए संबंधित सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार किया जा सके|
न्यायाधीशों की सूची और कार्यवाही की प्रकृति
इस मामले का फैसला न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने श्रीमती सोनी द्वारा दायर एक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए किया , जिसमें उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस की सहायता से जबरन बेदखल किए जाने को चुनौती दी थी
विवाद को जन्म देने वाले तथ्य
याचिकाकर्ता श्रीमती सोनी विवादित संपत्ति में अपने पति उनके परिवार और अपने तीन नाबालिग बच्चों (उम्र 3 से 8 वर्ष के बीच) के साथ रह रही थीं परिवार परिसर से एक ब्यूटी पार्लर और एक छोटी दुकान चला रहा था संपत्ति को पैतृक और अविभाजित आवासीय भूखंड होने का दावा किया गया था|
प्रतिवादी वादी की भूमिका
विवाद तब उत्पन्न हुआ जब प्रतिवादी संख्या 8 जो दीवानी मुकदमे में वादी है ने कथित तौर पर याचिकाकर्ता के पति और उसके भाई को प्रभावित करके याचिकाकर्ता के पति से अविभाजित संपत्ति के एक हिस्से की बिक्री विलेख प्राप्त कर ली प्रतिवादी कथित तौर पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में पेशकार के रूप में कार्यरत था हालांकि बाद में उसने दावा किया कि वह केवल प्रतिलिपि अनुभाग में क्लर्क था|
जबरन बेदखली का प्रयास
बिक्रीनामा प्राप्त करने के बाद, प्रतिवादी ने तहसीलदार और पुलिस अधिकारियों की सहायता से याचिकाकर्ता को जबरन बेदखल करने का प्रयास किया याचिकाकर्ता ने अपने नाबालिग बच्चों के साथ वहां रहने के अपने अधिकार का दावा करते हुए घर खाली करने से इनकार कर दिया। इस प्रतिरोध के बाद, प्रतिवादी ने दीवानी कार्यवाही शुरू कर दी|
दीवानी मुकदमा और एकतरफा निषेधाज्ञा
प्रतिवादी ने याचिकाकर्ता के पति और उसके भाई के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा का मुकदमा दायर किया एकतरफा अंतरिम निषेधाज्ञा जारी की गई जिसमें प्रतिवादियों को संपत्ति पर कब्जा करने ताला तोड़ने या निर्माण कार्य करने से रोका गया महत्वपूर्ण बात यह है कि निषेधाज्ञा आदेश में प्रतिवादी को संपत्ति का कब्जा सौंपने का कोई निर्देश नहीं था|
सीपीसी की धारा 151 का दुरुपयोग
इसके बाद, प्रतिवादी ने धारा 151 सीआरपीसी के तहत एक आवेदन दायर किया जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रतिवादियों ने ताला तोड़कर संपत्ति पर कब्जा कर लिया था इस आवेदन को उसी दिन एकतरफा सुनवाई के बाद स्वीकार कर लिया गया और पुलिस को पूर्व निषेधाज्ञा आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया|
अधिकारियों द्वारा अवैध रूप से बेदखल करना
इन आदेशों पर कार्रवाई करते हुए प्रशासनिक अधिकारियों ने एक राजस्व दल का गठन किया और याचिकाकर्ता और उसके बच्चों को संपत्ति से जबरन बेदखल कर दिया जबकि प्रतिवादी को संपत्ति का कब्जा सौंपने का कोई न्यायिक आदेश मौजूद नहीं था|
उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत के आचरण की जांच
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि निचली अदालत ने 05 फरवरी के आदेश को पारित करने में अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है|पीठ ने टिप्पणी की कि निचली अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXXIX नियम 3 की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूरी तरह से अनदेखी की जो न्यायालय को एकतरफा राहत प्रदान करते समय विपक्षी पक्ष को निषेधाज्ञा आवेदन और दस्तावेजों की तामील सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करती है|
अनिवार्य प्रक्रिया का उल्लंघन
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXXIX नियम 3 का अनुपालन सुनिश्चित किए बिना, धारा 151 के तहत दायर आवेदन पर एकतरफा निर्णय लिया गया याचिकाकर्ता और उसके नाबालिग बच्चों सहित प्रभावित पक्षों को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया|
सत्ता के दुरुपयोग पर टिप्पणियाँ
पीठ ने न्यायिक और प्रशासनिक दोनों कार्रवाइयों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि सत्ता का घोर दुरुपयोग हुआ है । उसने टिप्पणी की कि कार्यवाही में बरती गई जल्दबाजी से निचली अदालत द्वारा पारित आदेशों और प्रशासनिक अधिकारियों के आचरण की सत्यनिष्ठा पर गंभीर संदेह पैदा होता है|
स्वामित्व और अभिवेदनों पर निष्कर्ष
न्यायालय ने यह भी पाया कि दीवानी मुकदमे में यह दावा नहीं किया गया था कि याचिकाकर्ता के पति और उनके भाई संपत्ति के एकमात्र स्वामी थे यहां तक कि विक्रय विलेख में भी बेची जा रही संपत्ति के किसी स्पष्ट रूप से सीमांकित हिस्से का उल्लेख नहीं था। इसके अलावा, धारा 151 सीपीसी के तहत दायर आवेदन में ताला तोड़ने की कथित घटना की तारीख का भी उल्लेख नहीं था|
प्रशासनिक जांच की आवश्यकता
यह मानते हुए कि परिस्थितियां गंभीर चिंता का विषय हैं, न्यायालय ने निर्देश दिया कि निर्णय की एक प्रति इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष संबंधित सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू करने पर विचार करने के लिए रखी जाए|
उच्च न्यायालय के अंतिम निर्देश
रिट याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को संपत्ति का कब्ज़ा वापस दिलाने का निर्देश दिया गया न्यायालय ने याचिकाकर्ता और उसके तीन नाबालिग बच्चों को अवैध रूप से बेदखल किए जाने के कारण हुए मानसिक आघात के लिए प्रतिवादी वादी द्वारा देय एक लाख रुपये के मुआवजे का आदेश दिया|
निर्णय का कानूनी महत्व
यह निर्णय 1908 की सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की अनिवार्य प्रकृति को रेखांकित करता है और एक मजबूत अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है कि एकतरफा न्यायिक आदेशों और प्रशासनिक कार्रवाई का उपयोग कानून की उचित प्रक्रिया के बिना नागरिकों को बेदखल करने के लिए नहीं किया जा सकता है।
दैनिक सुदर्शन प्रवाह
ब्यूरो चीफ़
राजीव श्रीवास्तव









