बाराबंकी भूमि मामले में स्टांप शुल्क की मांग रद्द महिला खरीदार को धन वापसी के आदेश
लखनऊ–05 जनवरी
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने बाराबंकी जिले की महिला भूमि खरीदार श्रीमती रजिया खातून पर अतिरिक्त स्टांप शुल्क की मांग और जुर्माना लगाने वाले स्टांप अधिकारियों के आदेशों को रद्द कर दिया है|
न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों ने उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना या विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत किए बिना अनुमानों और एकतरफा रिपोर्टों के आधार पर कार्रवाई की थी|
*भूमि की खरीद और प्रारंभिक पंजीकरण*
यह विवाद जून 2013 में निष्पादित एक विक्रय विलेख से उत्पन्न हुआ|
श्रीमती रजिया खातून ने राजस्व अभिलेखों में कृषि भूमि के रूप में दर्ज एक भूखंड का आधा भाग खरीदा| पंजीकरण के समय उन्होंने प्रचलित सर्कल दर के आधार पर स्टांप शुल्क का भुगतान किया साथ ही आवासीय क्षेत्र के निकट होने के कारण अतिरिक्त शुल्क भी अदा किया|
*मौके पर निरीक्षण और कथित स्टाम्प शुल्क की कमी*
कुछ महीनों बाद उप-पंजीयक ने मौके पर निरीक्षण किया और स्टांप शुल्क में कमी पाई|
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि आस-पास की इमारतों जैसे दुकानें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और आरा मशीन के कारण भूमि में व्यावसायिक क्षमता है
इस रिपोर्ट के आधार पर कलेक्टर ने भारतीय स्टांप अधिनियम 1899 के तहत कार्यवाही शुरू की और ₹4.28 लाख से अधिक की राशि के साथ ₹1 लाख का जुर्माना और ब्याज की मांग की|
*एकतरफा आदेश और प्रक्रियात्मक अनियमितताएं*
कलेक्टर द्वारा प्रारंभिक आदेश एकतरफा पारित किया गया था जिसमें निरीक्षण या निर्णय से पहले श्रीमती रजिया खातून को कोई नोटिस नहीं दिया गया था|
जब वसूली की कार्यवाही शुरू हुई तो याचिकाकर्ता ने आदेश वापस लेने की मांग की
जिसे आंशिक जमा के बाद स्वीकार कर लिया गया। नई रिपोर्टें प्रस्तुत की गई लेकिन कलेक्टर ने फिर से केवल निरीक्षण नोटों पर भरोसा करते हुए भूमि को वाणिज्यिक भूमि के रूप में वर्गीकृत कर दिया जबकि भूमि कानूनों के तहत कोई रूपांतरण आदेश मौजूद नहीं था|
*पुनरीक्षण प्राधिकारी और असफल अपील*
याचिकाकर्ता ने कलेक्टर के आदेश को उपायुक्त (स्टाम्प) के समक्ष चुनौती दी लेकिन पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई|
बिना किसी स्वतंत्र तर्क के पुनरीक्षण प्राधिकारी ने केवल कलेक्टर के निर्णय की पुष्टि कर दी। इन कार्यवाही से निराश होकर श्रीमती रजिया खातून ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया|
*न्यायालय द्वारा कानूनी प्रक्रिया की जांच*
उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश स्टाम्प (संपत्ति मूल्यांकन) नियम, 1997 विशेष रूप से नियम 7(3)(सी) के अनुपालन का विश्लेषण किया जिसमें पक्षों को उचित सूचना दिए बिना निरीक्षण अनिवार्य है। न्यायालय ने पाया कि निरीक्षण से पहले उचित सूचना कभी नहीं दी गई थी और एकतरफा निरीक्षण रिपोर्ट अकेले बाजार मूल्य या देयता का निर्धारण नहीं कर सकती।
*बाजार मूल्य और अनुमानों पर न्यायालय की टिप्पणियाँ*
न्यायालय ने पाया कि अधिकारियों ने बिना किसी ठोस प्रमाण या तुलनीय बिक्री के भविष्य में व्यावसायिक उपयोग की धारणाओं के आधार पर कार्रवाई की। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि स्टांप शुल्क की गणना विक्रय विलेख निष्पादन की तिथि पर भूमि की वास्तविक प्रकृति और उपयोग के आधार पर की जानी चाहिए न कि इच्छित या भविष्य के उपयोग के आधार पर|
न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि आस-पास की व्यावसायिक गतिविधि कृषि भूमि को स्वतः ही व्यावसायिक भूमि में परिवर्तित कर देती है।
*सबूत का भार और दंड का आकलन*
राज्य अवमूल्यन साबित करने में विफल रहा|
व्यावसायिक मूल्यांकन का समर्थन करने के लिए कोई तुलनीय विक्रय विलेख या स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य में उपयोग या अनुमानित मूल्य अतिरिक्त स्टांप शुल्क या जुर्माने को उचित नहीं ठहरा सकते|
उचित तर्क के बिना मनमाने ढंग से जुर्माना नहीं लगाया जाना चाहिए।
*अंतिम निर्णय और धनवापसी संबंधी निर्देश*
न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि कलेक्टर का 4 फरवरी 2016 का आदेश और 24 मई 2017 का पुनरीक्षण आदेश गंभीर कानूनी खामियों से ग्रस्त थे और इन्हें पूर्णतयः रद्द कर दिया।
बाराबंकी के कलेक्टर को श्रीमती रजिया खातून द्वारा मुकदमे के दौरान जमा की गई सभी राशियों को निर्णय की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने के एक महीने के भीतर वापस करने का निर्देश दिया गया विलंबित वापसी पर छः प्रतिशत प्रति वर्ष की साधारण ब्याज दर लागू होगी|
रिट याचिका स्वीकार कर ली गई जिससे लंबे समय से चल रहा स्टांप शुल्क विवाद समाप्त हो गया|
दैनिक सुदर्शन प्रवाह
संवाददाता
राजीव श्रीवास्तव








