लखनऊ–26 मार्च
राजधानी में उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन (UPPCL) की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं। जहाँ एक ओर विभाग ‘निर्बाध बिजली’ का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर आउटसोर्सिंग कंपनी ‘क्वेस’ (Quess) ने गोमतीनगर ज़ोन में सैकड़ों संविदाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखाकर उनके घरों का ‘चिराग’ बुझा दिया है।
बिना किसी पूर्व सूचना या कार्य में कमी के,अचानक मोबाइल पर आए एक ‘मैसेज’ ने सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी छीन ली।
इसे ऊर्जा प्रबंधन का मास्टरस्ट्रोक कहें या संविदाकर्मियों के प्रति संवेदनहीनता लेकिन इस फैसले ने शहर की विद्युत व्यवस्था को ‘अंधेरे’ की ओर धकेल दिया है।
चहेतों पर मेहरबानी, कर्मठों पर मार: यह कैसा प्रबंधन?
सूत्रों और जानकारों की मानें तो इस पूरी छंटनी प्रक्रिया में ‘सिस्टम’ की जंग लगी कड़ियां साफ़ नज़र आ रही हैं|
अवर अभियंताओं (JE) की ‘जादुई’ लिस्ट:
चर्चा है कि हटाए जाने वाले कर्मियों की सूची तैयार करने में अवर अभियंताओं ने अपनी पसंद-नापसंद का भरपूर उपयोग किया।
भाई-भतीजावाद का ‘वोल्टेज’ हाई:
जिन कर्मियों पर बड़े साहबों या अवर अभियंताओं का वरदहस्त था,उन पर आंच तक नहीं आई।
जबकि सालों से धूप-बारिश में खंभों पर चढ़ने वाले गरीब संविदाकर्मियों को ‘संख्या ज्यादा’ होने का हवाला देकर दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंका गया।
मैसेज से मिली ‘बेरोजगारी’: किसी विभाग में वर्षों की सेवा का सिला एक झटके में डिजिटल मैसेज से मिलना, संविदाकर्मियों के आत्मसम्मान और जीवन यापन पर गहरा प्रहार है।
बड़े सवाल: कौन देगा इन आंसुओं का जवाब?
इस छंटनी के बाद ऊर्जा विभाग की कार्यशैली पर कुछ तीखे सवाल खड़े होते हैं:
अचानक ‘संख्या’ कैसे बढ़ गई?
अगर कर्मचारी ज्यादा थे, तो भर्ती के समय प्रबंधन की आंखें क्या बंद थीं या फिर यह नए ‘कमीशन’ के खेल के लिए जगह खाली करने की रणनीति है?
विद्युत आपूर्ति का क्या होगा? गर्मी का मौसम दस्तक दे रहा है। गोमतीनगर जैसे वीआईपी ज़ोन में जब सैकड़ों अनुभवी हाथ हटा दिए जाएंगे, तो क्या फॉल्ट होने पर अधिकारी खुद खंभों पर चढ़ेंगे?
जिम्मेदार कौन? अचानक सड़क पर आए इन कर्मियों और उनके बिलखते परिजनों के पेट की आग बुझाने की जिम्मेदारी क्या शासन लेगा या आउटसोर्सिंग कंपनी की मनमानी चलती रहेगी?
व्यंग्य: “लगता है ऊर्जा विभाग ने ‘लाइन लॉस’ कम करने के बजाय ‘लाइफ लॉस’ (जीवन यापन का नुकसान) करने की नई तकनीक ईजाद कर ली है। जब बिजली घर के मीटर नहीं, बल्कि गरीबों के चूल्हे बंद होने लगें, तो समझ लीजिए कि विभाग में ‘शॉर्ट सर्किट’ दिमागों में हुआ है, तारों में नहीं।”
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आउटसोर्सिंग कंपनियाँ संविदाकर्मियों को इंसान नहीं, बल्कि महज एक ‘नंबर’ समझती हैं जिसे जब चाहा मिटा दिया। अब देखना यह है कि ऊर्जा मंत्री और शासन इस ‘अंधेरगर्दी’ पर कब संज्ञान लेते हैं।
ब्यूरो रिपोर्ट
दैनिक सुदर्शन प्रवाह








