बाराबंकी–27 जनवरी
बाराबंकी शहर के मशहूर अज़ीमुद्दीन अशरफ़ इस्लामिया इण्टर कॉलेज में गणतंत्र दिवस के अवसर पर अज़ीमुश्शान मुशायरा एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।
संरक्षक जमशेद अहमद की मौजूदगी में मुशायरा एवं कवि की अध्यक्षता उस्ताद शायर हाजी नसीर अंसारी ने की। मुख्य अतिथि के तौर पर वरिष्ठ शायर हाशिम अली हाशिम एवं रिटायर्ड बेसिक शिक्षा सहायक निदेशक मुबीन अहमद मौजूद रहे। जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य एहरार अहमद, तारिक़ ख़ान और अख़्तर जमाल उस्मानी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
कार्यक्रम का संचालन बड़े ही खूबसूरत अंदाज में शायर शारिक़ शाकरी ने किया।
इससे पूर्व कॉलेज के प्रधानाचार्य जमशेद अहमद ने विद्यालय परिसर में झंडा रोहण किया। राष्ट्रीय गान के बाद भाषण प्रतियोगिता, गायन, नाटक मंचन जैसे कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए।
मुशायरा एवं कवि सम्मेलन में शायरों और कवियों ने एक से बढ़कर एक अश्आर पेश किए।
हाजी नसीर अंसारी – दर-बदर जो न फिराए वह नहीं इश्क कोई।होश जो खो ना दे आशिक़ के वो जलवा क्या है।।
हाशिम अली हाशिम-नित बनती है ये ज़ुरेफ़े ग़म।ज़िंदगी मेरी कूज़ा गर सी है।।
मोहसिन क़िदवई -किसी बुज़ुर्ग को कहना जो मोहतरम भूले। तो यूं लगा है के तहज़ीब अपनी हम भूले।।
सग़ीर नूरी -दुनिया से मिटाएंगे नफ़रत को मोहब्बत से।हम अहले मोहब्बत थे हम अहले मोहब्बत हैं।।
उस्मान मीनाई -हमारे काम ज़माने को याद हैं अब तक। हमारा नाम न लेने से कुछ नहीं होगा।।
डॉक्टर रेहान अलवी – हम अपने आज भी तेवर बला के रखते हैं।बड़ों के आगे मगर सर झुका के रखते हैं।।
वक़ार बाराबंकवी -ये दुनिया ख़ाने-क़ाहे इश्क है तो।हमारा दिल भी सज्जादा नशीं है।।
आदर्श बाराबंकवी -तौल कर सारे शब्द कहता हूं|अन्यथा मैं निशब्द रहता हूं||
सलीम सिद्दीक़ी –तवील रात है आगे घना अंधेरा है|अभी चराग़ बना लो अभी सवेरा है||
इरशाद बाराबंकवी –दिन रात कर रहे हैं जो मेरे लिए दुआ। अल्लाह उसको मुझसे ज़्यादा अता करे।।
फ़ौजान क़िदवई –लेता भी भला क्यों कोई संज्ञान हमारा।आया ना हमें ख़ुद भी कभी ध्यान हमारा।।
नफ़ीस बाराबंकवी –बात कहता हूं दिलों ईमान से|जश्न आजादी मनाओ शान से।।
शारिक़ शाकरी–ढूंढते,ढूंढते,ढूंढते, सच मुझे मिल गया | है वह ज़िंदा मगर सख़्त बीमार है||
आशुतोष त्रिपाठी–मैं लिखना वीर रस चाहूं मगर श्रृंगार लिखता हूं| दिलों में प्यार पैदा हो इसी से प्यार लिखता हूं||
सरवर किन्तूरी–सुकून मुमकिन नहीं बेताब दिल को तेरी फ़ुरक़त में | क़ुदूमें नाज़ पे सर हो तो आशिक़ को क़रार आए।।
लतीफ़ बाराबंकवी–हर रोज़ जो बनाता है सबके लिए मकान | रहता है आज भी वो किराए के घर में है||
मास्टर शुएब कामिल–हो फ़िक्र जिसमें मीर की ग़ालिब का वस्फ़ हो | ए काश वो मुझे ग़ज़ल ऐसी अता करें।।
सबा जहांगीराबादी-दर्द से दिल जवान होता है| आदमी तब महान होता है||
इनके अलावा हुज़ैल लालपुरी और बशर मसौलवी ने भी अपने-अपने कलाम पेश किए।
इस मौक़े पर चौधरी शुएब उर्फ़ शिब्बू, डॉक्टर ताजुद्दीन, फिरोज़ अख़्तर,अब्दुल माजिद, एडवोकेट मोहम्मद असिम, अरशद जमाल,सैयद मोहम्मद हारिस, चौधरी उस्मान सहित बड़ी तादाद में लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम के आख़िर में कॉलेज के प्रधानाचार्य जमशेद अहमद ने सभी शायरों और श्रोताओं का शुक्रिया अदा किया।
दैनिक सुदर्शन प्रवाह
ब्यूरो चीफ़
शिवम् अवस्थी








