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झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने वालों पर पुलिस को दर्ज करना होगा मुकदमा–उच्च न्यायालय

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प्रयागराज–17 जनवरी 

हाईकोर्ट ने कहा जांच-अधिकारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह सूचना देने वाले के खिलाफ झूठी गवाही और गुमराह करने पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराए|

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झूठे मुकदमों और पुलिस तंत्र के दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए निर्देश दिया है कि पुलिस जांच में पाया जाता है कि एफआईआर झूठी सूचना के आधार पर दर्ज कराई गई थी तो विवेचना अधिकारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह सूचना देने वाले के खिलाफ झूठी गवाही और गुमराह करने का लिखित परिवाद दर्ज कराए यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने दिया है|

यह इलाहाबाद उच्च न्यायालय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आदेश है जिसे न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी ने 14 जनवरी 2026 को पारित किया है|

यह आदेश उम्मे फरवा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में आया है जो फर्जी मुकदमों और पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करता है|

इस आदेश के मुख्य बिंदु और विस्तृत जानकारी नीचे दी गई है:–

1.मामले का संदर्भ

यह याचिका BNSS की धारा 528 के तहत दायर की गई थी इसमें आवेदक ने अपने खिलाफ दर्ज फर्जी मुकदमे और मजिस्ट्रेट द्वारा लिए गए संज्ञान को चुनौती दी थी|

2.पुलिस और जांच

अधिकारियों के लिए सख्त निर्देश

न्यायालय ने पाया कि कई मामलों में पुलिस बिना उचित जांच के या गलत तथ्यों के आधार पर चार्जशीट दाखिल कर देती है|

अदालत ने स्पष्ट किया है कि धारा 212 और 217 BNS यदि कोई व्यक्ति पुलिस को झूठी सूचना देता है, तो पुलिस अधिकारी की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह उस व्यक्ति के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करे|

अधिकारियों की जवाबदेही

यदि जांच अधिकारी थाना प्रभारी या क्षेत्राधिकारी और लोक अभियोजक नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ धारा 199(b) बी एन एस के तहत कार्रवाई की जा सकती है|

3.अदालती अवमानना की चेतावनी

आदेश के पैरा 50 में कोर्ट ने बहुत सख्त रुख अपनाया है:

यदि पुलिस अधिकारी या न्यायिक अधिकारी इस आदेश का अक्षरश: पालन नहीं करते हैं तो इसे अवमानना माना जाएगा पीड़ित व्यक्ति अवमानना की कार्यवाही के लिए सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है|

4. 60 दिनों की समय सीमा

अदालत ने पुलिस अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने और कानूनी प्रक्रियाओं को विनियमित करने के लिए इस आदेश की तारीख (14 जनवरी 2026) से 60 दिनों का समय दिया है|

5.न्यायिक अधिकारियों के लिए संदेश

अदालत ने संबंधित मजिस्ट्रेट के स्पष्टीकरण को कुछ हद तक संतोषजनक पाया और कहा कि इस आदेश की टिप्पणियों का उनके करियर या सेवा रिकॉर्ड पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन भविष्य में सतर्क रहने का संकेत दिया|

निष्कर्ष और महत्व

यह आदेश उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जिन्हें झूठे मुकदमों में फंसाया जाता है। अब पुलिस केवल चार्जशीट दाखिल करके अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती यदि शिकायत झूठी पाई जाती है तो पुलिस को शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई करनी ही होगी अन्यथा पुलिस अधिकारी खुद अपराधी माने जाएंगे

संक्षेप में यह आदेश फर्जी केस कल्चर को खत्म करने और जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है

पुलिस अफसरों पर हो सकती है कार्यवाही कोर्ट ने कहा कि यदि विवेचक जांच के बाद यह पाता है कि आरोप झूठे थे और क्लोजर रिपोर्ट लगाता है, तो उसे सूचना देने वाले के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 212 और 217 के तहत लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 199 (बी) के तहत कार्रवाई की जा सकती है|

60 दिन में आदेश का पालन करना है कोर्ट ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम राज सिंह (1998) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि झूठी सूचना के अपराधों में कोर्ट लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना संज्ञान नहीं ले सकता इसलिए पुलिस द्वारा शिकायत दर्ज करना अनिवार्य है कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और न्यायिक अधिकारियों को 60 दिन के भीतर जिन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है|

झूठी सूचना पर कार्रवाई अनिवार्य

जब भी पुलिस किसी मामले में यह कहते हुए अंतिम रिपोर्ट लगाती है कि आरोप झूठे या भ्रामक थे तो पुलिस को अनिवार्य रूप से सूचना देने वाले और गवाहों के खिलाफ बीएनएसएस की धारा 215(1)के तहत लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी|

मजिस्ट्रेट की भूमिका

मजिस्ट्रेट ऐसी अंतिम रिपोर्ट को तब तक स्वीकार न करें जब तक उसके साथ झूठी सूचना देने वाले के खिलाफ लिखित शिकायत न हो यदि प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की जाती है तो पुलिस की शिकायत पर कार्यवाही तब तक रुकी रहेगी जब तक प्रोटेस्ट पिटीशन पर निर्णय नहीं हो जाता|

अवमानना की चेतावनी

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का पालन न करना अदालत की अवमानना माना जाएगा|

इस मामले में न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने यह भी साफ किया कि असंज्ञेय अपराधों में पुलिस की रिपोर्ट को स्टेट केस नहीं बल्कि परिवाद माना जाना चाहिए इसी के साथ कोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें असंज्ञेय मामले में पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञेय अपराध की तरह संज्ञान लिया गया था|

मामला वैवाहिक विवाद का है:

पति ने अपनी पत्नी (याची) के खिलाफ क्वार्सी थाने में आईपीसी की धारा 504 और 507 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी पति का आरोप था कि उसकी पत्नी जो कोरिया में किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है फेसबुक के जरिए उसे और उसकी बेटी को बदनाम कर रही है और भारत लौटने पर जान से मारने की धमकी दी है|

पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगायी

पुलिस ने मामले की जांच की और आरोपों को झूठा पाते हुए अंतिम रिपोर्ट लगा दी इसके बाद पति ने प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की तो अलीगढ़ के सीजेएम ने प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार करते हुए अंतिम रिपोर्ट खारिज कर दी और सीआरपीसी की धारा 190 (1)(बी) के तहत मामले का संज्ञान लेते हुए इसे स्टेट केस के रूप में चलाने का आदेश दिया|

स्टेट केस के रूप में दर्ज करना कानूनन गलत

याची के वकील ने तर्क दिया कि वैवाहिक कलह के कारण याची को दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाया गया है उन्होंने कहा कि पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट लगाई थी और अपराध असंज्ञेय प्रकृति के थे इसलिए मजिस्ट्रेट का इसे स्टेट केस के रूप में दर्ज करना कानूनन गलत था पति और सरकारी वकील ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने जांच के दौरान एकत्र सबूतों का सही मूल्यांकन किया है और आदेश में कोई अवैधता नहीं है|

पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट को परिवाद माना जाएगा

कोर्ट ने पाया कि आईपीसी की धारा 504 और 507 असंज्ञेय और जमानती अपराध हैं. कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 2(डी) के स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कहा कि असंज्ञेय अपराध में पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट को परिवाद माना जाएगा और पुलिस अधिकारी को परिवादी समझा जाएगा कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अलीगढ़ ने कानून के प्रावधानों का पालन नहीं किया|

हाई कोर्ट ने मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेजा असंज्ञेय अपराध को संज्ञेय अपराध की तरह माना सीजेएम को इस मामले को परिवाद के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए था इसी के साथ कोर्ट ने अलीगढ़ सीजेएम के संजान आदेश को रद्द कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया कोर्ट ने निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेट अब कानून के अनुसार और आरोपी को सुनवाई का मौका देते हुए तीन महीने के भीतर नया पारित आदेश करें|

                                       दैनिक सुदर्शन प्रवाह 

                                               ब्यूरो चीफ़ 

                                            राजीव श्रीवास्तव 

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