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सर्वोच्च न्यायालय ने हत्याभियुक्त की सजा कम की कहा जेल भेजना कठोर

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नई दिल्ली–15 जनवरी

हत्या के दोषी 80 वर्षीय व्यक्ति की सजा कम की गई सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इस उम्र में उन्हें जेल भेजना कठोर होगा|

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1992 में एक ग्रामीण झड़प के दौरान एक व्यक्ति की हत्या के दोषी एक बुजुर्ग व्यक्ति की सजा को कम करते हुए उसे पहले से भुगती गई सजा तक सीमित कर दिया है| भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग II के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए न्यायालय ने दोषी की बढ़ती उम्र (जो अब 80 वर्ष से अधिक है ) को ध्यान में रखते हुए कहा कि उसे दोबारा जेल भेजना कठोर और अन्यायपूर्ण होगा|

इसमें शामिल पीठ और न्यायाधीश

यह फैसला न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारी और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनाया

जिन्होंने दोषसिद्धि पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा लेकिन मानवीय आधार पर सजा में संशोधन किया|

घटना की पृष्ठभूमि

यह मामला मध्य प्रदेश के दुदानखेड़ी गांव में 10 दिसंबर 1992 को घटी एक घटना से संबंधित है|आरोपी श्रीकृष्ण और मृतक राम सिंह के बेटों के बीच झगड़ा हुआ| जब राम सिंह अपने बेटे पर हुए हमले के संबंध में श्रीकृष्ण से पूछताछ करने गए तो स्थिति दोनों पक्षों के सदस्यों के बीच झड़प में तब्दील हो गई|

मृत्यु का कारण बनने वाली घटना

झगड़े के दौरान राम सिंह को लाठी से गंभीर रूप से घायल कर दिया गया उन्हें तुरंत चिकित्सा उपचार के लिए ले जाया गया लेकिन अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई जिसके परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण और अन्य के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया|

ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही

1997 में ट्रायल कोर्ट ने श्रीकृष्णा और अन्य आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के साथ धारा 149 के तहत दोषी ठहराया उन्हें हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई इस आधार पर कि अपराध गैरकानूनी सभा द्वारा किया गया था|

उच्च न्यायालय द्वारा मामले का पुनर्मूल्यांकन

अपील पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों की पुनः जांच की और निष्कर्ष निकाला कि यह घटना बिना किसी पूर्वचिंता या सामान्य उद्देश्य के हुई एक स्वतंत्र झड़प थी| तदनुसार उच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को धारा 302 आईपीसी से बदलकर धारा 304 भाग IIआईपीसी कर दिया जो हत्या न करने के इरादे से किए गए गैर इरादतन हत्या से संबंधित है, और सजा को घटाकर सात वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने में बदल दिया|

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील

उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए श्रीकृष्ण ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया और अपने ऊपर लगाए गए दोषसिद्धि और सजा दोनों में हस्तक्षेप की मांग की|

दोषसिद्धि पर सर्वोच्च न्यायालय के निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के तर्क को बरकरार रखते हुए पुष्टि की कि यह अपराध भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग II के अंतर्गत आता है न्यायालय ने पाया कि यह घटना अचानक हुई कहासुनी और आपसी हाथापाई के परिणामस्वरूप घटी थी और राम सिंह को जान से मारने का कोई इरादा नहीं था हालांकि आरोपी को इस बात की जानकारी थी कि चोट से मृत्यु हो सकती है|

अपराध की प्रकृति पर टिप्पणियाँ

न्यायालय ने गौर किया कि यह झड़प हंगामे और गुटों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता के माहौल में हुई थी और यहाँ तक कि आरोपी श्री कृष्णा को भी इसी घटना के दौरान सिर में गंभीर चोटें आई थी इन तथ्यों से यह निष्कर्ष पुष्ट होता है कि यह कृत्य बिना पूर्वचिंता के किया गया था जो इसे हत्या से अलग करता है|

सजा कम करने का कारण

श्रीकृष्ण की आयु अब 80 वर्ष से अधिक होने को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें वापस जेल भेजना कठोर और अनुचित होगा| न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि न्याय व्यवस्था को असंवेदनशील नहीं होना चाहिए विशेषकर वृद्ध दोषियों से जुड़े मामलों में|

सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय

भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता द्वारा पहले से भुगती गई सजा की अवधि तक सजा को कम कर दिया इस संशोधन के साथ, अपील खारिज कर दी गई|

मामले का निष्कर्ष

यह फैसला आपराधिक जवाबदेही को बरकरार रखने और मानवीय विचार दिखाने के बीच संतुलन को दर्शाता है खासकर तब जब दोषी की उम्र अधिक हो और अपराध दशकों पहले एक अचानक हुए ग्रामीण संघर्ष के संदर्भ में हुआ हो|

मामले का विवरण

वाद शीर्षक:–श्रीकृष्ण बनाम मध्य प्रदेश राज्य

                                 दैनिक सुदर्शन प्रवाह 

                                        ब्यूरो चीफ़

                                    राजीव श्रीवास्तव 

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