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पॉक्सो अधिनयम मामले में जमानत रद्द सुप्रीम कोर्ट ने कहा उच्च न्यायालय ने अपराध की गंभीरता को किया नजरअंदाज

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पोक्सो अधिनियम 2012 के तहत नाबालिग से बलात्कार के मामले में जमानत रद्द सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि उच्च न्यायालय ने अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज किया|

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम 2012 के तहत एक गंभीर मामले में आरोपी को जमानत दी गई थी|

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जमानत का आदेश अनुचित तर्कहीन और महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी करते हुए पारित किया गया था विशेष रूप से नाबालिग लड़की पर बार-बार यौन उत्पीड़न के आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जमानत रद्द कर दिया|

पीठ और न्यायिक अवलोकन

यह फैसला न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने सुनाया| न्यायालय ने कहा कि यद्यपि आरोपपत्र दाखिल होने से जमानत पर विचार करने में कोई बाधा नहीं आती फिर भी न्यायालयों का यह कर्तव्य है कि वे अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर विचार करें विशेषकर तब जब आरोप बच्चों के खिलाफ जघन्य अपराधों से संबंधित हों|

मामले में लगाए गए आरोपों की प्रकृति

अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता से परिचित आरोपी ने अपने साथियों के साथ मिलकर छह महीने की अवधि में नाबालिग लड़की का बार-बार यौन उत्पीड़न किया|
आरोप है कि ये कृत्य देसी पिस्तौल (कट्टा) से धमकाकर और डरा-धमकाकर किए गए थे| आगे आरोप है कि आरोपियों ने यौन कृत्यों को मोबाइल फोन पर रिकॉर्ड किया और इन वीडियो का इस्तेमाल पीड़िता को ब्लैकमेल करने और धमकाने के लिए किया|

एफआईआर का पंजीकरण और जांच

स्थानीय पुलिस की प्रारंभिक अनिच्छा के बाद अंततः 2 दिसंबर 2024 को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई|
जांच के दौरान ऐसे साक्ष्य एकत्र किए गए जिनसे बच्चे के बार-बार यौन शोषण का संकेत मिलता है|
सत्र न्यायालय ने अपराध की गंभीरता का आकलन करने के बाद आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी|

उच्च न्यायालय द्वारा जमानत प्रदान करना

सत्र न्यायालय द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के बावजूद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अप्रैल 2025 में आरोपी को जमानत दे दी|
उच्च न्यायालय का यह आदेश आरोप पत्र दाखिल होने के बाद पारित किया गया था जिसमें पीओसीएसओ अधिनियम की वैधानिक कठोरता और पीड़ित पर अपराध के प्रभाव पर विस्तृत विचार नहीं किया गया था|

पीड़ित की सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील

जमानत मिलने से नाराज होकर पीड़ित ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया| न्यायालय के संज्ञान में यह भी लाया गया कि जमानत पर रिहा होने के बाद आरोपी गांव में पीड़ित को धमका रहा था जिससे उसे गंभीर भय और मानसिक पीड़ा हो रही थी|

अपराध की गंभीरता पर सर्वोच्च न्यायालय का मत

न्यायमूर्ति आर.महादेवन ने फैसला सुनाते हुए कहा कि उच्च न्यायालय यह समझने में विफल रहा कि आरोपों में नाबालिग पर बार-बार यौन उत्पीड़न जैसे जघन्य और गंभीर अपराध शामिल हैं जो धमकियों और ब्लैकमेल के जरिए किए गए थे|
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि ऐसा कृत्य समाज की सामूहिक चेतना को झकझोर देता है और पीड़ित बच्चे के जीवन पर विनाशकारी प्रभाव डालता है|

पीड़ित की सुरक्षा का ध्यान रखना

सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि आरोपी और पीड़िता दोनों एक ही इलाके में रहते हैं जिससे धमकी और आगे के मानसिक आघात की वास्तविक और तत्काल आशंका पैदा होती है|
न्यायालय ने बाल कल्याण समिति की परामर्श रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें दर्ज किया गया था कि पीड़िता लगातार भय और मनोवैज्ञानिक तनाव में जी रही थी|

POCSO मामलों में जमानत संबंधी कानूनी सिद्धांत

न्यायालय ने दोहराया कि यद्यपि जमानत को यांत्रिक रूप से अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए फिर भी इसे अप्रासंगिक आधारों पर या महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी करके भी प्रदान नहीं किया जाना चाहिए|
पीओसीएसओ अधिनियम के अंतर्गत अपराधों में गवाहों को धमकाने साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने और पीड़ित को धमकी देने की संभावना महत्वपूर्ण कारक हैं जिनकी न्यायालयों को सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए|

उच्च न्यायालय के जमानत आदेश पर निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि उच्च न्यायालय का आदेश महत्वपूर्ण दिशा-निर्देशों की कमी प्रासंगिक कारकों पर विचार न करने और तथ्यों के गलत आकलन से ग्रस्त था| न्यायालय ने कहा कि ऐसा आदेश न्याय के उल्लंघन का कारण बनता है और इसलिए इसमें हस्तक्षेप आवश्यक है|

सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्देश

अपील स्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपी को दी गई जमानत रद्द कर दी|
आरोपी को फैसले की तारीख से दो सप्ताह के भीतर संबंधित न्यायालय के समक्ष आत्म समर्पण करने का निर्देश दिया गया|

मामले का निष्कर्ष

यह फैसला इस बात को पुष्ट करता है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों को पीड़ित की सुरक्षा गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को सर्वोपरि महत्व देना चाहिए और इन बातों की अनदेखी करते हुए पारित किए गए जमानत आदेशों को मान्य नहीं किया जा सकता है|

अंतिम मामले का विवरण

मुकदमे का शीर्षक: X बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य

                                       दैनिक सुदर्शन प्रवाह 

                                                ब्यूरो चीफ़ 

                                             राजीव श्रीवास्तव 

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