दोष सिद्ध हुए बिना किसी आपराधिक मामले में मात्र कारावास सीआईएसएफ कर्मियों को सेवा से हटाने का आधार नहीं हो सकता: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
लखनऊ–09 जनवरी
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है यह फैसला सीआईएसएफ के एक हेड कांस्टेबल से संबंधित है जिसने आपराधिक मामले में आरोपी होने के बाद अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी| न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें बर्खास्तगी को रद्द कर दिया गया था|
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी सीआईएसएफ कर्मचारी के कारावास के आधार पर अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती|
एफआईआर और गिरफ्तारी का विवरण
याचिकाकर्ता विजय कुमार पांडे केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) में हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे|
2019 में हत्या के एक मामले में उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302,201 और 120-बी के तहत एफआईआर दर्ज की गई|
एफआईआर के बाद उन्हें हिरासत में लिया गया और कुछ समय के लिए जेल में रखा गया। जमानत मिलने के बाद उन्होंने ड्यूटी पर वापस आने का प्रयास किया लेकिन अधिकारियों ने उन्हें सीआईएसएफ नियम 2001 के नियम 33 के उप-नियम 2 के तहत निलंबित कर दिया|
बाद में आपराधिक मामले में उनकी संलिप्तता का हवाला देते हुए उन्हें औपचारिक रूप से सेवा से बर्खास्त कर दिया गया|
याचिकाकर्ता ने बर्खास्तगी को दी चुनौती
अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय का रुख किया|
न्यायालय ने बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए कहा कि बर्खास्तगी की सजा देने के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करना किसी भी तथ्यात्मक या कानूनी आधार के बिना था|भारत सरकार ने इस फैसले के खिलाफ विशेष अपील दायर की|सीआईएसएफ अधिनियम परन्यायालय की टिप्पणी
न्यायालय ने सीआईएसएफ अधिनियम 1968 की धारा 8(1) का हवाला दिया जो बल के सदस्यों को इस आधार पर बर्खास्त करने हटाने या पदावनत करने की अनुमति देती है कि पर्यवेक्षक अधिकारी उन्हें कर्तव्य में लापरवाही बरतने वाला उपेक्षित या अयोग्य मानता है। हालांकि न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि यह प्रावधान भारत के संविधान के अनुच्छेद 311 के अधीन है जो सिविल सेवकों को उचित प्रक्रिया के बिना बर्खास्तगी या हटाने से सुरक्षा प्रदान करता है|
उच्च न्यायालय का तर्क
पीठ ने गौर किया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एकमात्र आरोप यह था कि वह जेल में रह चुका था|चूंकि आपराधिक मामले में मुकदमा अभी लंबित था और कोई दोषसिद्धि दर्ज नहीं की गई थी इसलिए यह निष्कर्ष निकालना अनुचित था कि उसने अपने कर्तव्यों में लापरवाही बरती थी|
न्यायालय ने कहा यह अकल्पनीय है कि अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने या बर्खास्तगी आदेश पारित करने के चरण में कोई भी प्राधिकारी केवल जेल में रहने के आधार पर यह निष्कर्ष कैसे निकाल सकता है कि याचिकाकर्ता कर्तव्य के लिए अयोग्य था भले ही अपराध कितना भी जघन्य क्यों न हो|
सत्यनिष्ठा और अनुमान पर निर्णय
न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि बिना किसी तथ्यात्मक या कानूनी आधार के केवल दोष सिद्ध होने की आशंका के आधार पर बर्खास्तगी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है|
न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि दोष सिद्ध हुए बिना या मुकदमे की कार्यवाही में किसी भी अवलोकन के बिना यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं था कि याचिकाकर्ता में सत्यनिष्ठा या कर्तव्यनिष्ठा की कमी थी|
अतः बर्खास्तगी आदेश को अनुचित और अवैध घोषित किया गया|
मुकदमे की सुनवाई के दौरान निलंबन
याचिकाकर्ता सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त कर चुका था इसलिए न्यायालय ने फैसला सुनाया कि मुकदमे की अवधि के दौरान उसे निलंबित रखा जा सकता है| हालांकि न्यायालय ने बकाया भुगतान और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों के संबंध में निर्णय संबंधित नियमों के अनुसार सक्षम प्राधिकारी पर छोड़ दिया|
निर्णय का निष्कर्ष
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखते हुए सीआईएसएफ कर्मचारी के अधिकारों की रक्षा की|
इस फैसले ने इस सिद्धांत को सुदृढ़ किया कि केवल कारावास ही अनुशासनात्मक कार्यवाही या बर्खास्तगी का आधार नहीं बन सकता और सीआईएसएफ नियम 2001 और भारत के संविधान के अनुच्छेद 311 के अनुसार उचित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने के महत्व पर प्रकाश डाला|
याचिकाकर्ता बनाम प्रतिवादी
भारत संघ गृह मंत्रालय के सचिव सीजीओ कॉम्प्लेक्स, नई दिल्ली और चार अन्य बनाम विजय कुमार पांडेय|
दैनिक सुदर्शन प्रवाह
ब्यूरो चीफ़
राजीव श्रीवास्तव








