रामसनेही घाट/बाराबंकी–09 मार्च
निस्कापुर (छुलिहा) में चल रही भव्य रामकथा के तीसरे दिन कथा व्यास राम देव दास रामायणी ने भगवान श्रीराम और भरत जी के आदर्श प्रेम का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने रामायण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि भरत जी का मन सदैव प्रभु श्रीराम के चरणों में ही लगा रहता था। उनका जीवन त्याग, समर्पण और भाईचारे की अद्भुत मिसाल है।
कथावाचक राम देव दास रामायणी ने बताया कि जब भरत जी को यह पता चला कि माता कैकेयी के कारण प्रभु श्रीराम को वनवास जाना पड़ा है, तो वे अत्यंत व्यथित हो उठे। उन्होंने राज्य और राजसुख को ठुकरा दिया तथा प्रभु श्रीराम को अयोध्या वापस लाने के लिए वन की ओर प्रस्थान किया।
कथा में चित्रकूट के उस मार्मिक प्रसंग का भी वर्णन किया गया, जब राम और भरत का मिलन हुआ। उस समय दोनों भाइयों की आँखों से प्रेम के आँसू बहने लगे। रामायण में वर्णन मिलता है कि भरत जी ने प्रभु राम से अयोध्या लौटने का आग्रह किया, किंतु जब श्रीराम ने पिता की आज्ञा को सर्वोपरि बताया, तब भरत जी ने उनकी चरण पादुका को अयोध्या के सिंहासन पर स्थापित कर स्वयं नंदिग्राम में तपस्वी जीवन व्यतीत करते हुए चौदह वर्षों तक प्रभु राम की प्रतीक्षा की।
कथावाचक ने कहा कि राम और भरत का यह प्रेम हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम त्याग, समर्पण और धर्म के पालन में निहित होता है। कथा के दौरान श्रद्धालु राम-भरत के प्रेम प्रसंग को सुनकर भावविभोर हो उठे और पूरे परिसर में “जय श्रीराम” के जयकारे गूंज उठे।
इस अवसर पर जिला पंचायत अध्यक्ष राजरानी रावत, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता अनिमेष सिंह राहुल सुरेश चंद्र कसौंधन,लल्ला यादव,दुर्गा प्रसाद पाण्डेय,दीपक वर्मा,माता पल्टन, बाबा परमेंद्र विक्रम सिंह सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण कर धर्म लाभ प्राप्त किया।
ब्यूरो रिपोर्ट
दैनिक सुदर्शन प्रवाह








